फिल्म समीक्षाओं मे ईमानदारी का पतन : क्यों 3.5 स्टार अब ‘जीरो स्टार ‘ के बराबर है|

एक दौर था जब 2-स्टार रेटिंग का मतलब होता था कि देखने लायक है—यानी फिल्म में कमियां तो हैं, लेकिन उसे देखा जा सकता है। लेकिन आज के दौर मे जब किसी फिल्म को 3.5 स्टार मिलते हैं और फिर भी उसे देखना किसी सजा जैसा लगे, तो समझ लीजिए कि सिस्टम पूरी तरह खराब हो चुका है। आइए देखते है कुछ कारण जिसकी वजह से मूवीज की समीक्षा का स्टार इतना गिर गया है|

  • 1. “बड़े बैनर” का दबाव 

    अगर किसी फिल्म में कोई ए-लिस्ट सुपरस्टार और बड़ा प्रोडक्शन हाउस शामिल है, तो उसे काम से काम ढाई से तीन स्टार मिलन तय रहता  है । आलोचक अक्सर बड़ी फिल्मों की बुराई करने से कतराते हैं। स्क्रिप्ट कितनी भी खोखली हो या एक्टिंग कितनी भी खराब हो लेकिन  प्रोजेक्ट का भारी-भरकम बजट अक्सर निष्पक्ष आलोचना की आंखों पर पट्टी बांध देता है।

    2. सेलिब्रिटी बने फिल्म समीक्षक

    आजकल स्टार रेटिंग एक आलोचनात्मक मूल्यांकन के बजाय मार्केटिंग का टूल बन गई है। आज के शीर्ष समीक्षक केवल लेखक नहीं, बल्कि इन्फ्लुएंसर हैं। वे उन्हीं रेड कार्पेट पर चलते हैं और उन्हीं एलीट पार्टियों में शामिल होते हैं जिनमें फिल्मी सितारे होते हैं। जब आपको डर हो कि आपकी समीक्षा आपके ‘डिनर पार्टनर’ को नाराज कर सकती है, तो निष्पक्ष रहना मुश्किल हो जाता है।

    3. मानवीय पूर्वाग्रह (और व्यक्तिगत एजेंडे)

    समीक्षक भी इंसान हैं, और आधुनिक युग मे  व्यक्तिगत “पूर्वाग्रह  को व्यक्त करने का चलन बढ़ गया  है। चाहे वह राजनीतिक झुकाव हो, किसी खास शैली (Genre) के प्रति पक्षपात हो, या किसी निर्देशक के खिलाफ व्यक्तिगत खुन्नस—समीक्षाएं अक्सर फिल्म की गुणवत्ता से ज्यादा समीक्षक की आंतरिक सोच  को दर्शाती हैं।

    4. “पेड रिव्यू” की महामारी

    सबसे कड़वा सच: बाप बड़ा  न भैया सबसे बड़ा रुपैया | जिस इंडस्ट्री में “पॉजिटिव रिव्यू” किसी सामान की तरह खरीदे और बेचे जा सकते हैं, वहां फिल्म समीक्षा पैसा कमाने का साधन बन गया है । कुछ समीक्षकों को तारीफ करने के लिए पैसे दिए जाते हैं, जबकि कुछ को—जो कि ज्यादा खतरनाक है—किसी प्रतिद्वंद्वी की फिल्म को फ्लॉप कराने (Tank करने) के लिए पैसे मिलते हैं।

    • अगर समीक्षकों पर भरोसा नहीं, तो किस पर करें?

      चूंकि स्टार रेटिंग अब अब भरोसे के लायक नहीं रह गई है इसलिए , समझदार दर्शक अपनी रणनीति बदल रहे हैं। यदि आप जानना चाहते हैं कि कोई फिल्म आपके तीन घंटे और मेहनत की कमाई के लायक है या नहीं, तो इन चार पैमानों से की फिल्म को देखने का मन बनाए पर ध्यान दें:

      • “वर्ड ऑफ माउथ” (लोगों की राय): सोशल मीडिया पर आम लोगों की असली प्रतिक्रियाएं किसी भी प्रोफेशनल कॉलम की तुलना में पीआर (PR) के दिखावे को ज्यादा जल्दी बेनकाब कर देती हैं।
      • बॉक्स ऑफिस पर टिके रहना: एक शानदार ओपनिंग वीकेंड मार्केटिंग के दम पर तो खरीदा जा सकता है; लेकिन दूसरे और तीसरे हफ्ते में मजबूती का मतलब है कि दर्शकों को वाकई फिल्म पसंद या रही है |
      • निर्देशक का ट्रैक रिकॉर्ड: अभिनेता फिल्म का चेहरा होते हैं, लेकिन निर्देशक उसकी आत्मा। एक भरोसेमंद निर्देशक पर दांव लगाना किसी खरीदे गए समीक्षा की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित है।
      • प्रोडक्शन हाउस की साख: कुछ बैनरों का एक “क्वालिटी स्टैंडर्ड” होता है। वे शायद हर बार मास्टरपीस न दें, लेकिन वे शायद ही कभी देखने लायक फिल्म न बनाएं।

      निष्कर्ष: पेड हाइप के इस दौर में, आपकी अपनी सूझबूझ और दर्शकों की सामूहिक आवाज ही एकमात्र “5-स्टार” गाइड बची है।

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